कृष्णार्पित काव्यशिल्प

  • सर्व काव्यरचना स्वरचित व कॉपीराईट आहेत.

मंगळवार, १४ जून, २०२२

घाट संसाराचा


*दि. १२/६/२०२२*

*विषय - संसार*

*काव्यप्रकार - अभंग*

(६-६-६-४)


घाट संसाराचा


संसाराचे सुख | चमक बेगडी ||

विकारांची बेडी| सुटेनाच ||१||


येथे विषयांनी | उच्छाद मांडले ||

पाठीशी लागले | निशदिन ||२||


संसार नि सुख | जणू की विलोम ||

सुखाची ती गोम | विठू पायी ||३||


संसाराचा घाट | भातुकली खेळ||

कर्मांचा तो मेळ || बसवाया  ||४||


पुरे येरझार | आळवे हरीणी ||

श्रीहरी चरणी | देई दास्य ||५||


साधनेत साध |  मोक्ष हेचि लक्ष्य ||

षडांचे तू भक्ष्य | होऊ नको ||६||


सरोजासमान | राहूनी अलिप्त ||

जागव त्या सुप्त | चेतनेस ||७||


कर्मगतीस्तव | लाभलिसे 'कारा' ||

गुंफू श्वास सारा | हरीनामी ||८||


दुःखांचे हे मूळ | खुळं सारं सुख || 

होता अंतर्मुख | आत्मानंद ||९||


संसार 'तो' हवा | अंतर्बाह्य हरी || 

सुधाही विखारी | जयापुढे ||१०||

रचना

©शिल्पा म वाघमारे

स. शि

जि प प्रा शाळा मालेगाव खु ता गेवराई जि बीड 

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत: