कृष्णार्पित काव्यशिल्प

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मंगळवार, १० मार्च, २०२०

रंगो की बहार

रंगो की बहार.... होली का त्यौहार

रंग रंग हो जाये हम सब
क्या तेरा क्या मेरा...
सूरज की हर किरण मे जो
 सप्तरंग बिखेरा....

सृष्टी की हर रंग बहार
खुशियो की अनोखी फुहार
फिर क्या रंग बसंती और क्या रंग हरा
आनंद की है वह भरमार....

रंगो मे डुब कर मस्त मगन
कर दे रंगीन दिल सारे
भेद जो पनपे युगो युगो से
उखाड फेक मनवा रे

जहाँ की रंगो मे रंग के तू
समा जा एक होके
प्रज्वलित हो जाए मितरा
अखियों के लाख झरोके

ऐसी मस्ती मे खो जा
दर्पण कर देना मन को
हर कोई समा पाए ऐसा
सागर कर दे जीवन को...

रचना✒
©शिल्पा म वाघमारे
सहशिक्षिका जि प प्रा शाळा मालेगाव खुर्द
 ता गेवराई जि बीड
दि. १०.०३.२०