कृष्णार्पित काव्यशिल्प

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बुधवार, ६ नोव्हेंबर, २०१९

🙏🏻 अभंग दान धर्म ( )

: दान धर्म (शांतरस अभंग )


रत्न-कंकणांनी | हात का शोभती|
 सजती-खुलती | दानानेच ||१||

दानाचे महत्व | जाणावे पुराणी ||
सदा ते स्मरणी | असू द्यावे ||२||

नित्य, नैमित्तिक| काम्यरुपी दान|| 
 प्रकार हे तीन | ऋग्वेदात ||३||

सढळ हातांनी | करा सदा दान||
 नको अभिमान | अंतरात ||४||

कळो नये दुज्या|एका त्या हाताचे|
गंध कर्तव्याचे | मोहरावे ||५||

 वीर तो अमर| कर्ण महादानी|
 दातृत्वाचा धनी |युगे युगे||६||

दिव्य दानतत्त्व |अक्षय सुखात|
 येई पदरात | परतोनी||७||

जीवनात दान| सर्वश्रेष्ठ धर्म|
 तृप्तीचे हे मर्म | जाणुनी घे ||८||

निस्वार्थी ते दान |महादाता देव
 भोगतात जीव |जळी-स्थळी ||९||

सुपात्रास सदा| दान ते करावे |
 जगती दिखावे |करू नये ||१०||

विद्या, नेत्र, कन्या |दान श्रेष्ठ पुण्य|
 करी तोचि धन्य | जन्मांतरी||११||

चोहीकडे सृष्टी |नदी आणि तरु|
 करूनी घे गुरु| तयांसिच ||१२||

व्यय उपभोगी |लया जाई धन |
 दान आजीवन | न करी जो ||१३||

नांदी यावी मनी|नवविचारांची|
 आशा बदल्याची |नसो तेथे||१४||

रचना
© शिल्पा म.वाघमारे
सहशिक्षिका बीड
दि 16.01.2019
10/6/19, 07:33 

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